मेरी दृष्टि से मेरी जिंदगी
आज बाबूजी की पुण्य तिथि है और यह तिथि हमारे लिए विशेष तीन साल पहले बनी थी पिताजी की उम्र 50 वर्ष के आस पास रही होगी उस वक़्त मैं 13 का साल का रहा होऊंगा पिताजी कारखाने मै काम करते थे माँ बताया करती है कि मेरे पिताजी के पिताजी यानी कि मेरे दादा भी उसी मैं काम किया करते थे ।पिताजी को एक बहुत ही बुरी लत थी शराब पीने की और वे अपने अंतिम समय मैं भी शराब के नशे मैं सराबोर थे।मैंने जब भी पिताजी को सुना उनके मुह से सिर्फ गालियां ही निकली ।या गालियों के सहारे निकली बाते ।मेरे स्मृति पटल पर एक ही रील बार -बार दौड़ा करती जैसे कि पारिवारिक क्लेश ।बता देना चाहूंगा की मुझसे दो साल बडा मेरा एक भाई भी है और एक साल छोटी बहन ।वैसे तो गृह क्लेश हमारे वातावरण मैं अपनी पैठ बनाए रखता था किंतु मैं और मेरी छोटी बहन की इस पर प्रतिक्रिया यही रहती की...हम रोने के अलावा कुछ नही कर सकते थे बडा भाई समझाता की अपने दिल को पक्का कर लो क्यूंकि ये क्लेश नही शांत होना.. इस परिवेश मैं रहके मैने मेरी बी ए की पढ़ाई की...सच कहूँ तो मेरी विवाह को लेके अवधारणा 10 के होते-होते बहुत ही दृढ़ हो गयी थी ।कि अगर इसे विवाह सूत्र मैं बंधना कहते है तो ऐसे विवाह को मैं कभी अपने जीवन मे नही घटने दूंगा..हमारे घर का वातवरण कुछ अलग ही प्रकार का रहा।कहा जाता है कि बेटे के आने जाने पर रोक टोक नही लगाई जाती किन्तु मेरे साथ इसके विपरीत था ।किंतु वही बडे भाई के लिए इस प्रकार की रोक टोक नही थी।जिसके कारण त्तथा अन्य कारणों की वजह से मुझे उनसे ईर्ष्या रहती थी।मैं शुरुवाती स्तर से अपनी दादी के पास पला बड़ा हुआ तथा आज भी उन्ही की छाया मैं फल फूल रहा हुआ ।दादी का सानिध्य मेरे लिए माँ से भी अधिक जरूरी था । दादी का मंगल सूत्र कहा जाता था मुझे ..कारण भी तो था दादी जहा भी जाती मैं उनके साथ -साथ जाता था।मगर अब नही जाता अब बडा हो गया हूं न दादी तो आज भी जिद किया करती है कि चल किन्तु अब व्यस्तता रहती है और जिम्मेदारी भी।पिताजी से जिंदगी मैं परमिशन मांगने के अलाव कोई अधिक बात नही हुई ।कितना कुछ कहना चाहता था मैं मगर कह ही नही पाया मेरे दोस्तों के पिता का स्वभाव अपने बच्चों के साथ दोस्तो की तरह रहता था जिससे कि वह अपनी मनोव्यथा को प्रकट कर देते थे ।मेरा संबंध मेरे पिता से इसी प्रकार का था जजिसमे शब्दो की कमी थी ये बात मुझे आज भी खलती है....।( leena)
आज बाबूजी की पुण्य तिथि है और यह तिथि हमारे लिए विशेष तीन साल पहले बनी थी पिताजी की उम्र 50 वर्ष के आस पास रही होगी उस वक़्त मैं 13 का साल का रहा होऊंगा पिताजी कारखाने मै काम करते थे माँ बताया करती है कि मेरे पिताजी के पिताजी यानी कि मेरे दादा भी उसी मैं काम किया करते थे ।पिताजी को एक बहुत ही बुरी लत थी शराब पीने की और वे अपने अंतिम समय मैं भी शराब के नशे मैं सराबोर थे।मैंने जब भी पिताजी को सुना उनके मुह से सिर्फ गालियां ही निकली ।या गालियों के सहारे निकली बाते ।मेरे स्मृति पटल पर एक ही रील बार -बार दौड़ा करती जैसे कि पारिवारिक क्लेश ।बता देना चाहूंगा की मुझसे दो साल बडा मेरा एक भाई भी है और एक साल छोटी बहन ।वैसे तो गृह क्लेश हमारे वातावरण मैं अपनी पैठ बनाए रखता था किंतु मैं और मेरी छोटी बहन की इस पर प्रतिक्रिया यही रहती की...हम रोने के अलावा कुछ नही कर सकते थे बडा भाई समझाता की अपने दिल को पक्का कर लो क्यूंकि ये क्लेश नही शांत होना.. इस परिवेश मैं रहके मैने मेरी बी ए की पढ़ाई की...सच कहूँ तो मेरी विवाह को लेके अवधारणा 10 के होते-होते बहुत ही दृढ़ हो गयी थी ।कि अगर इसे विवाह सूत्र मैं बंधना कहते है तो ऐसे विवाह को मैं कभी अपने जीवन मे नही घटने दूंगा..हमारे घर का वातवरण कुछ अलग ही प्रकार का रहा।कहा जाता है कि बेटे के आने जाने पर रोक टोक नही लगाई जाती किन्तु मेरे साथ इसके विपरीत था ।किंतु वही बडे भाई के लिए इस प्रकार की रोक टोक नही थी।जिसके कारण त्तथा अन्य कारणों की वजह से मुझे उनसे ईर्ष्या रहती थी।मैं शुरुवाती स्तर से अपनी दादी के पास पला बड़ा हुआ तथा आज भी उन्ही की छाया मैं फल फूल रहा हुआ ।दादी का सानिध्य मेरे लिए माँ से भी अधिक जरूरी था । दादी का मंगल सूत्र कहा जाता था मुझे ..कारण भी तो था दादी जहा भी जाती मैं उनके साथ -साथ जाता था।मगर अब नही जाता अब बडा हो गया हूं न दादी तो आज भी जिद किया करती है कि चल किन्तु अब व्यस्तता रहती है और जिम्मेदारी भी।पिताजी से जिंदगी मैं परमिशन मांगने के अलाव कोई अधिक बात नही हुई ।कितना कुछ कहना चाहता था मैं मगर कह ही नही पाया मेरे दोस्तों के पिता का स्वभाव अपने बच्चों के साथ दोस्तो की तरह रहता था जिससे कि वह अपनी मनोव्यथा को प्रकट कर देते थे ।मेरा संबंध मेरे पिता से इसी प्रकार का था जजिसमे शब्दो की कमी थी ये बात मुझे आज भी खलती है....।( leena)
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